जोधपुर में सम्पत्ति और राजस्व के मामले: कौन-सी अदालत, किस क्रम में, कितने दिन में
जोधपुर में ज़मीन का झगड़ा सबसे पहले forum का सवाल है, हक़ का बाद में। कृषि भूमि, नामांतरण, खातेदारी और बँटवारा राजस्व न्यायालय में तय होते हैं; मालिकाना हक़ का विवाद सिविल न्यायालय में; और राजस्व अपील प्राधिकरण या राजस्व मण्डल से गुज़रने के बाद ही मामला Article 226/227 के रास्ते जोधपुर बेंच पहुँचता है।
रातानाडा के चैम्बर में ज़मीन की फ़ाइलें लेकर आने वाले पक्षकारों से बातचीत में एक बात लगातार दिखती है: कागज़ प्रायः पूरे होते हैं, पर वे ग़लत दरवाज़े पर तीन साल लगा चुके होते हैं। इसलिए यह पृष्ठ हक़ की बहस नहीं, सीढ़ी समझाता है: कौन-सा मामला तहसीलदार के सामने शुरू होता है, कौन-सा सहायक कलेक्टर के, कहाँ से अपील कहाँ जाती है, कितने दिन में, और वह कौन-सा मोड़ है जहाँ से मामला सचमुच उच्च न्यायालय का बनता है।
पहला प्रश्न हक़ का नहीं, क्षेत्राधिकार का है
राजस्थान में सिविल और राजस्व न्यायालय के बीच की रेखा विधि ने ख़ुद खींची है, और दोनों तरफ़ से बंद की है। काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 207(1) कहती है कि तृतीय अनुसूची में वर्णित प्रकृति के सभी वाद और आवेदन राजस्व न्यायालय ही सुनेगा; धारा 207(2) उसके आगे किसी अन्य न्यायालय को संज्ञान लेने से रोकती है। असली पेंच उसके स्पष्टीकरण में है: यदि वाद-कारण ऐसा है जिस पर राजस्व न्यायालय राहत दे सकता था, तो यह निरर्थक है कि सिविल न्यायालय से माँगी गई राहत उससे बड़ी, अतिरिक्त या भिन्न है। खातेदारी के विवाद को घोषणात्मक वाद का नाम देकर सिविल न्यायालय में ले जाने की कोशिश इसी स्पष्टीकरण पर टूटती है। अर्ज़ी का नाम बदलने से दरवाज़ा नहीं बदलता।
दूसरी तरफ़ भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 259 उस अधिनियम के अंतर्गत उठने वाले मामलों में सिविल न्यायालय का क्षेत्राधिकार वर्जित करती है, पर उसका परंतुक एक खिड़की छोड़ता है: सीमा-विवाद या estate-holders के बीच किसी अन्य विवाद में यदि title का प्रश्न अंतर्ग्रस्त हो, तो उस प्रश्न के निर्णय के लिए सिविल वाद लाया जा सकता है। और जब दोनों तरफ़ से खींचातानी हो, तो निर्णायक बात भू-राजस्व अधिनियम की धारा 8 का परंतुक है: जहाँ सिविल या राजस्व न्यायालय के क्षेत्राधिकार के निर्धारण पर संदेह या विवाद हो, वहाँ उच्च न्यायालय का निर्णय अंतिम होगा और राज्य के सभी सिविल तथा राजस्व न्यायालयों पर, राजस्व मण्डल सहित, बाध्यकारी होगा। जोधपुर बेंच में क्षेत्राधिकार का प्रश्न इसी कारण स्वतंत्र रूप से उठाया जा सकता है, और यही एक अवस्था है जहाँ सीढ़ी चढ़े बिना याचिका टिकती है।
राजस्व की सीढ़ी, जिस क्रम में सचमुच चढ़ी जाती है
काश्तकारी अधिनियम की धारा 220 का नियम लोग सबसे पहले तोड़ते हैं: तृतीय अनुसूची के वाद सक्षम न्यायालयों में सबसे निचले दर्जे के न्यायालय में ही संस्थित होंगे। कलेक्टर के पास सीधे अर्ज़ी लगाने से मामला ऊँचा नहीं होता, लौट आता है। यह क्रम चुना नहीं जाता। अनुसूची में बँटवारे का वाद (धारा 53), अतिक्रमी की बेदख़ली का वाद (धारा 183) और स्थायी निषेधाज्ञा का वाद (धारा 188) — तीनों सहायक कलेक्टर के खाते में हैं। धारा 221 अधीनता तय करती है: ज़िले के अतिरिक्त कलेक्टर, उपखण्ड अधिकारी, सहायक कलेक्टर और तहसीलदार कलेक्टर के अधीन, और सभी राजस्व न्यायालय राजस्व मण्डल के अधीन।
अपील का रास्ता दो अधिनियमों में समानांतर चलता है और प्रायः गड्डमड्ड कर दिया जाता है। काश्तकारी के वादों में धारा 223: तहसीलदार की मूल डिक्री की अपील कलेक्टर के पास, और सहायक कलेक्टर, उपखण्ड अधिकारी या कलेक्टर की मूल डिक्री की अपील Revenue Appellate Authority के पास। धारा 224(1): कलेक्टर द्वारा अपील में पारित डिक्री की अपील RAA के पास। धारा 224(2): RAA की अपीलीय डिक्री से राजस्व मण्डल तक अपील केवल चार आधारों पर — निर्णय विधि के या विधि का बल रखने वाली प्रथा के विरुद्ध हो; निर्णय विधि का कोई महत्वपूर्ण विवाद्यक तय करने से चूक गया हो; प्रक्रिया में ऐसी सारभूत त्रुटि हो जो गुण-दोष के निर्णय में त्रुटि उत्पन्न कर सकती थी; या जहाँ अपीलीय न्यायालय ने तथ्य के किसी निष्कर्ष को बदला या पलटा हो वहाँ निर्णय अभिलेख के साक्ष्य-भार के विरुद्ध हो। यह सूची बंद है। अंतिम आधार ध्यान देने योग्य है: तथ्यों पर द्वितीय अपील तब तक उपलब्ध ही नहीं है जब तक RAA ने नीचे का निष्कर्ष उलटा न किया हो।
अभिलेख, नामांतरण और भू-उपयोग जैसे शुद्ध राजस्व मामलों में भू-राजस्व अधिनियम की धारा 75(1)(क) तहसीलदार से कलेक्टर तक, धारा 75(1)(ख) सहायक कलेक्टर, उपखण्ड अधिकारी या कलेक्टर से RAA तक, और धारा 76 RAA से राजस्व मण्डल तक ले जाती है। मण्डल, धारा 8 के शब्दों में, राजस्थान का अपील, पुनरीक्षण और निर्देश का सर्वोच्च राजस्व न्यायालय है और अजमेर में बैठता है। धारा 10 का परंतुक यहाँ एक कम जाना-पहचाना अधिकार देता है: एकल सदस्य के निर्णय से व्यथित पक्ष दो या अधिक सदस्यों की खंडपीठ के समक्ष एक माह के भीतर विशेष अपील कर सकता है, बशर्ते निर्णय देने वाला सदस्य घोषित करे कि मामला अपील योग्य है।
वे तारीख़ें जो चुपचाप निकल जाती हैं
सम्पत्ति के मामलों में जोधपुर में जितने उपाय परिसीमा से मरते हैं, उतने बहस से नहीं। चार घड़ियाँ याद रखने लायक हैं।
तीन माह, कब्ज़े की सूचना की। भू-राजस्व अधिनियम की धारा 133 कहती है कि जो व्यक्ति उत्तराधिकार, अंतरण या अन्यथा कब्ज़ा प्राप्त करे, वह कब्ज़ा मिलने की तारीख़ से तीन माह के भीतर तहसीलदार को उसकी सूचना दे — सीधे, या गाँव के पटवारी अथवा भू-अभिलेख निरीक्षक के माध्यम से। धारा 134 इस चूक पर जो दण्ड रखती है वह दस रुपये से अधिक नहीं है, और यही वजह है कि सूचना कोई नहीं देता; जमाबंदी वर्षों पुरानी चलती रहती है और विवाद तब खुलता है जब बेचने की बारी आती है। धारा 135(1) के अंतर्गत निर्विवाद मामलों में तहसीलदार जाँच कर वार्षिक रजिस्टरों में इंद्राज कर देता है; धारा 135(2) के अंतर्गत विवादित होने पर वह सक्षम हो तो स्वयं तय करता है, और सक्षम न हो तो सक्षम अधिकारी को निर्णय हेतु निर्दिष्ट करता है।
तीस, साठ और नब्बे दिन, अपील की। भू-राजस्व अधिनियम की धारा 78 तीन अलग अवधियाँ देती है, आदेश की तारीख़ से गिनी जाने वाली: कलेक्टर, भू-अभिलेख अधिकारी या बंदोबस्त अधिकारी के समक्ष तीस दिन; RAA, बंदोबस्त आयुक्त या भू-अभिलेख निदेशक के समक्ष साठ दिन; और राजस्व मण्डल के समक्ष नब्बे दिन। धारा 79 के अनुसार अपील की अर्ज़ी के साथ आदेश की प्रमाणित प्रति लगनी चाहिए, जब तक उसकी प्रस्तुति से अभिमुक्ति न दी जाए — और जोधपुर में समय अपील लिखने में नहीं, वही प्रति मिलने में जाता है। इसलिए प्रमाणित प्रति का आवेदन उसी दिन लगाइए जिस दिन आदेश हुआ है, अपील का मन बनाने के बाद नहीं। प्रति पहले, अपील बाद में।
अंतरिम आदेश पर अपील नहीं। धारा 77(1)(घ) के अनुसार अंतरिम आदेश से कोई अपील नहीं होती। राजस्व न्यायालय का अंतरिम आदेश कष्टकर हो तो उपाय अपील नहीं, वही न्यायालय या उच्चतर शक्ति है — और यही वह जगह है जहाँ Article 227 कभी-कभी सचमुच काम आता है।
बारह वर्ष, तीन वर्ष, और कोई अवधि नहीं। काश्तकारी अधिनियम की तृतीय अनुसूची परिसीमा वाद-वार देती है: धारा 183 के अंतर्गत अतिक्रमी की बेदख़ली का वाद — वाद-कारण उत्पन्न होने से बारह वर्ष; धारा 188 के अंतर्गत स्थायी निषेधाज्ञा का वाद — तीन वर्ष; और धारा 53 के अंतर्गत खाते के बँटवारे का वाद — कोई परिसीमा नहीं। यह आख़िरी पंक्ति व्यवहार में सबसे काम की है। कृषि भूमि का बँटवारा कालातीत नहीं होता, इसलिए तीस-चालीस वर्ष पुराना संयुक्त खाता आज भी बाँटा जा सकता है।
बँटवारा: धारा 53 Rajasthan Tenancy Act
धारा 53(2) खाते का विभाजन दो ही तरीक़ों से मानती है: सह-काश्तकारों के बीच करार से — और वह करार विभाजन तथा विभाजित हिस्सों पर लगान के बँटवारे, दोनों को कवर करता हुआ होना चाहिए — या एक या अधिक सह-काश्तकारों के वाद में सक्षम न्यायालय की डिक्री या आदेश से। जिन दो उपधाराओं पर वाद सबसे ज़्यादा लौटते हैं वे हैं धारा 53(4), जिसके अनुसार विभाजन के प्रत्येक वाद में सभी सह-काश्तकार और landholder पक्षकार बनाए जाने चाहिए, और धारा 53(5), जिसके अनुसार एक से अधिक खातों के विभाजन का एक ही वाद तभी चलेगा जब पक्षकार वही हों। ध्यान रहे कि धारा 53 की उपधारा (1) और (3) 11-11-1992 से विलोपित हैं, इसलिए पुराने प्रारूप पर बना वाद आज अपने आप दोषपूर्ण होता है। प्रारूप हर बार जाँच लीजिए। प्रक्रिया का विस्तार धारा 53 के अंतर्गत कृषि भूमि के बँटवारे वाले लेख में है, और सह-हिस्सेदारों के बीच आवासीय या व्यावसायिक सम्पत्ति का बँटवारा सिविल पक्ष पर बँटवारे के वाद के रूप में चलता है।
जमाबंदी में नाम ग़लत है — यह मुकदमा नहीं है
Apna Khata से निकाली गई नक़ल में नाम, पिता का नाम या खसरा संख्या ग़लत छपी हो तो पहली प्रतिक्रिया वाद दायर करने की होती है, जबकि भू-राजस्व अधिनियम की धारा 136 इसके लिए अलग रास्ता देती है: भू-अभिलेख अधिकारी किसी भी समय अधिकार-अभिलेख या रजिस्टर में लिपिकीय त्रुटियाँ और वे त्रुटियाँ, जिन्हें हितबद्ध पक्षकार हुई मानते हों, निर्धारित रीति से शुद्ध कर सकता है। उसी धारा का परंतुक दूसरी दिशा में भी काम करता है: जहाँ त्रुटि किसी राजस्व अधिकारी ने निरीक्षण के दौरान देखी हो, वहाँ पक्षकारों को कारण बताओ नोटिस दिए बिना कोई शुद्धि नहीं की जाएगी। अर्थात् स्वीकृत त्रुटि के लिए आवेदन पर्याप्त है। और पीठ पीछे बिना नोटिस की गई "शुद्धि" स्वयं चुनौती का आधार बनती है।
इससे आगे की बात स्मरण रखने योग्य है कि नामांतरण हक़ पैदा नहीं करता, केवल राजकोषीय अभिलेख है — यह स्थिति बलवंत सिंह बनाम दौलत सिंह (Balwant Singh v. Daulat Singh, 1997) से तय है। अभिलेख हक़ नहीं देता, और नामांतरण की पूरी प्रक्रिया नामांतरण एवं अपना खाता वाले लेख में अलग से दी गई है। जिस चैम्बर में ये कदम उठाए जाते हैं, उसका नामांकन, पता और कार्यालय समय जोधपुर में अधिवक्ता वाले पृष्ठ पर है।
जब मामला जोधपुर बेंच तक पहुँचता है
राजस्व मण्डल या RAA के आदेश के विरुद्ध Article 226/227 की याचिका जोधपुर बेंच में चलती है, पर वह सीढ़ी का विकल्प नहीं है। सीढ़ी पहले, याचिका बाद में। व्यवहार में तीन ही स्थितियाँ टिकती हैं: क्षेत्राधिकार का प्रश्न (धारा 8 के परंतुक के कारण यह उच्च न्यायालय का अपना क्षेत्र है), नैसर्गिक न्याय का उल्लंघन (जैसे धारा 136 के परंतुक का नोटिस दिए बिना अभिलेख बदल देना), और ऐसा आदेश जो कोई राजस्व न्यायालय पारित ही नहीं कर सकता था। एक चौथा, कम आज़माया हुआ रास्ता भू-राजस्व अधिनियम की धारा 84 है: जहाँ मण्डल तक अपील नहीं होती, वहाँ मण्डल स्वयं न्यायिक प्रकृति के मामले का अभिलेख तलब कर सकता है यदि नीचे के न्यायालय ने ऐसा क्षेत्राधिकार प्रयोग किया जो विधि ने उसे नहीं दिया, या दिया हुआ क्षेत्राधिकार प्रयोग करने से चूक गया। कई बार यह पुनरीक्षण याचिका से तेज़ पड़ता है। आज़माने लायक है। जोधपुर बेंच का क्षेत्र जोधपुर के साथ बाड़मेर, जैसलमेर, पाली, जालोर और सिरोही तक फैला है, इसलिए इन ज़िलों के राजस्व आदेश यहीं परखे जाते हैं।
पहली मुलाकात में कौन-से कागज़ साथ लाएँ
- जमाबंदी की नक़ल — Apna Khata से डाउनलोड की हुई भी चलेगी
- खसरा नक़्शा या trace map, यदि सीमा का विवाद है
- विवादित आदेश की प्रमाणित प्रति, तारीख़ सहित
- रजिस्ट्री, दान-पत्र, वसीयत या पट्टे की प्रति
- नामांतरण का आवेदन और उस पर हुई कार्यवाही
- सभी सह-खातेदारों के नाम और पते — धारा 53(4) के लिए
जिस एक कागज़ के बिना काम रुकता है वह विवादित आदेश की प्रमाणित प्रति है, क्योंकि धारा 79 उसे अपील के साथ माँगती है और धारा 78 की घड़ी तब भी चलती रहती है जब प्रति नकल शाखा में अटकी हो।
जो सवाल रातानाडा में सबसे ज़्यादा पूछे जाते हैं
तहसीलदार ने नामांतरण ख़ारिज कर दिया — सीधे हाईकोर्ट जा सकते हैं?
नहीं। धारा 75(1)(क) के अंतर्गत प्रथम अपील कलेक्टर के पास जाती है, और धारा 78(क) के अनुसार आदेश की तारीख़ से तीस दिन के भीतर। इस अवस्था में याचिका लगाने पर जोधपुर बेंच प्रायः सांविधिक उपाय की ओर लौटा देती है, और लौटने तक तीस दिन निकल चुके होते हैं।
खातेदारी का झगड़ा सिविल कोर्ट में declaration suit बनाकर ले जाया जा सकता है?
नहीं। धारा 207(2) का स्पष्टीकरण यही बंद करता है: सिविल न्यायालय से माँगी गई राहत राजस्व न्यायालय की राहत से बड़ी, अतिरिक्त या भिन्न होने से क्षेत्राधिकार नहीं बदलता। अर्ज़ी का नाम बदलने से दरवाज़ा नहीं बदलता।
तीस साल पुराने संयुक्त खाते का बँटवारा अब भी हो सकता है?
हाँ। तृतीय अनुसूची में धारा 53 के बँटवारे के वाद पर कोई परिसीमा निर्धारित नहीं है, और वह सहायक कलेक्टर के समक्ष चलता है। शर्त धारा 53(4) है — सभी सह-खातेदार और landholder पक्षकार हों। बँटवारे के वाद परिसीमा से नहीं, छूटे हुए पक्षकारों से मरते हैं।
राजस्व मण्डल के एकल सदस्य के आदेश के विरुद्ध क्या उपाय है?
धारा 10 के परंतुक के अंतर्गत खंडपीठ के समक्ष एक माह में विशेष अपील, बशर्ते निर्णय देने वाला सदस्य मामले को अपील योग्य घोषित करे। वह घोषणा की प्रतीक्षा में एक माह निकाल देना आम चूक है; उसके बाद Article 226/227 बचता है।
किसी ने कृषि भूमि पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा कर लिया है — कितने समय में वाद करना होगा?
धारा 183 के अंतर्गत बेदख़ली का वाद सहायक कलेक्टर के समक्ष, वाद-कारण से बारह वर्ष के भीतर। धारा 183(1) अतिक्रमी पर प्रत्येक कृषि वर्ष के लिए वार्षिक लगान के पंद्रह गुना तक दण्ड भी डालती है। भूमि सीधे राज्य सरकार से धारित हो तो धारा 183(2) तहसीलदार को भू-राजस्व अधिनियम की धारा 91 की प्रक्रिया पर भेजती है।
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