राजस्थान में संपत्ति विवाद सर्वाधिक मुकदमेबाज़ी वाले मामलों में से हैं, और सही विधिक मंच (forum) का चयन पहला निर्णायक कदम है। यहाँ क्षेत्राधिकार सिविल न्यायालयों (सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 द्वारा शासित), राजस्व न्यायालयों (राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 एवं राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 द्वारा शासित), तथा राजस्व पदानुक्रम के शीर्ष पर स्थित राजस्व मंडल के बीच विभाजित है। गैर-कृषि भूमि के स्वामित्व से जुड़े टाइटल विवाद सामान्यतः सिविल न्यायालय में जाते हैं, जबकि कृषि काश्तकारी अधिकारों, नामांतरण एवं भूमि-वर्गीकरण से संबंधित विवाद राजस्व न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आते हैं।
बँटवारे का वाद सी.पी.सी. के आदेश 20 नियम 18 के अंतर्गत तब दायर किया जाता है जब किसी संपत्ति (पैतृक हो या स्वअर्जित) के सह-स्वामी अपने हिस्सों का भौतिक विभाजन चाहते हैं। न्यायालय पहले प्रत्येक पक्ष का हिस्सा निर्धारित करते हुए प्रारंभिक डिक्री पारित करता है, फिर संपत्ति का भौतिक विभाजन करने हेतु स्थानीय आयुक्त (Local Commissioner) नियुक्त करता है। जहाँ भौतिक विभाजन संभव नहीं — जैसे एकल कक्ष वाला आवास — वहाँ न्यायालय विक्रय एवं आगमों के वितरण की डिक्री दे सकता है। राजस्थान में कृषि भूमि के बँटवारे हेतु प्रायः नामांतरण (खसरा/खतौनी अद्यतन) के लिए राजस्व प्राधिकारी के समक्ष समानांतर कार्यवाही आवश्यक होती है।
टाइटल (स्वामित्व) विवाद तब उत्पन्न होते हैं जब दो पक्ष एक ही संपत्ति पर स्वामित्व का दावा करते हैं। मूल नियम यह है कि वादी को अपना टाइटल स्वयं सिद्ध करना होता है और वह प्रतिवादी के टाइटल की कमज़ोरी पर निर्भर नहीं रह सकता (nemo dat quod non habet)। टाइटल के साक्ष्य में पंजीकृत विक्रय-विलेख, दान-विलेख, उत्तराधिकार दस्तावेज़, नामांतरण प्रविष्टियाँ एवं निरंतर कब्ज़ा सम्मिलित हैं। न्यायालय कठोर प्रमाण-भार मानक लागू करता है: टाइटल का दावा करने वाले को इसे ठोस एवं विश्वसनीय साक्ष्य से स्थापित करना होता है।
प्रतिकूल कब्ज़ा (Adverse Possession) परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 27 के अंतर्गत किसी व्यक्ति को, जो दूसरे की भूमि पर खुले, विरोधी, निरंतर एवं अबाधित कब्ज़े में 12 वर्ष (निजी भूमि हेतु) तक रहा हो, स्वामी के टाइटल का अंत करने का अधिकार देता है। उच्चतम न्यायालय के हेमाजी वाघाजी जाट बनाम भिखाभाई खेंगारभाई हरिजन (2009) निर्णय के पश्चात् न्यायालयों ने अधिक कठोर दृष्टिकोण अपनाया है: प्रतिकूल कब्ज़ा एक परिपक्व अधिकार तभी बनता है जब उसके समस्त तत्व संदेह से परे सिद्ध हों।
राजस्थान में संपत्ति क्रेताओं को सलाह दी जाती है कि विक्रय-विलेख निष्पादित करने से पूर्व एकीकृत पंजीयन एवं राजस्व प्रणाली (IGRS) पोर्टल के माध्यम से भार (encumbrance) की जाँच करें, सिविल न्यायालयों में लंबित वाद देखें, तथा राजस्व अभिलेखों (जमाबंदी, गिरदावरी) की पड़ताल करें। टाइटल सत्यापन हेतु अधिवक्ता की सहायता लेना तथा पर्याप्त क्षतिपूर्ति (indemnity) उपबंधों सहित सुप्रारूपित विक्रय-अनुबंध बनवाना भविष्य के दीर्घकालिक विवादों को टाल सकता है।