राजस्थान की भू-राजस्व प्रणाली मुख्यतः राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956, राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 तथा राजस्व न्यायालय प्रक्रिया नियमों द्वारा शासित है। राज्य कृषि भूमि हेतु विस्तृत राजस्व अभिलेख रखता है: (1) खसरा — खेत-संख्या, क्षेत्रफल, मिट्टी की प्रकृति, फसल एवं काबिज़ व्यक्ति का नाम दर्ज करने वाला खेतवार रजिस्टर; (2) खतौनी — किसी गाँव में एक व्यक्ति द्वारा धारित समस्त खसरा संख्याओं को सूचीबद्ध करने वाला जोतवार रजिस्टर; (3) जमाबंदी / अधिकार-अभिलेख — पटवारी द्वारा प्रत्येक पाँच वर्ष में तैयार किया जाने वाला व्यापक राजस्व दस्तावेज़। ये अभिलेख डिजिटल रूप में Apna Khata पोर्टल (apnakhata.raj.nic.in) पर उपलब्ध हैं।
नामांतरण (इंतकाल / दाखिल-खारिज): नामांतरण किसी विक्रय, दान, उत्तराधिकार, बँटवारे या न्यायालयी डिक्री के पश्चात् कब्ज़े/स्वामित्व में परिवर्तन को राजस्व अभिलेखों में अद्यतन करने की प्रक्रिया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि राजस्व अभिलेख में नामांतरण से टाइटल न तो सृजित होता है और न समाप्त — यह मात्र एक राजकोषीय अभिलेख है (उच्चतम न्यायालय द्वारा बलवंत सिंह बनाम दौलत सिंह, 1997 में स्थिर)। नामांतरण आवेदन तहसीलदार के समक्ष किया जाता है, जो प्रभावित व्यक्तियों को सूचना देता है, आपत्तियाँ प्राप्त करता है, और जाँच के बाद नामांतरण आदेश पारित करता है। अपील उपखंड अधिकारी, फिर कलेक्टर, फिर राजस्व मंडल तक होती है।
राजस्व न्यायालय का क्षेत्राधिकार: राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम एवं काश्तकारी अधिनियम के अंतर्गत राजस्व न्यायालयों को इन विषयों पर अनन्य क्षेत्राधिकार है: काश्तकारी विवाद; कृषि भूमि के बँटवारे के विवाद; राजस्व अभिलेखों में दर्ज अधिकारों से जुड़े विवाद; तथा कृषि जोत सीमा अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाहियाँ। जो विषय अनन्य रूप से राजस्व न्यायालयों को सौंपे गए हैं, उन पर सिविल न्यायालय का क्षेत्राधिकार नहीं है।
राजस्व मंडल: अजमेर में स्थित राजस्थान राजस्व मंडल राज्य का सर्वोच्च राजस्व न्यायालय है। यह राजस्व मामलों में अपीलीय, पुनरीक्षण एवं निर्देश क्षेत्राधिकार रखता है। राजस्व विधि के प्रश्नों पर मंडल के निर्णय समस्त अधीनस्थ राजस्व न्यायालयों पर आबद्धकारी हैं। मंडल के निर्णयों की आगे न्यायिक समीक्षा केवल राजस्थान उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226/227 के अंतर्गत होती है।
राजस्थान में सामान्य मुद्दे: (1) खातेदारी अधिकार — काश्तकारी अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित अवधि तक भूमि जोतने वाले काश्तकार को खातेदारी (अधिभोग) अधिकार प्राप्त होते हैं, जो उत्तराधिकार-योग्य हैं तथा कुछ प्रतिबंधों सहित अंतरणीय हैं। (2) भू-उपयोग परिवर्तन — कृषि भूमि का गैर-कृषि उपयोग कलेक्टर से रूपांतरण (conversion) अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता। (3) सरकारी भूमि पर अतिक्रमण — राजस्व प्राधिकारियों द्वारा सरसरी बेदखली की शक्तियों से निपटाया जाता है।