राजस्थान में खातेदारी कृषि भूमि का बँटवारा सामान्य सिविल बँटवारे से भिन्न है। इसका शासन राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 53 द्वारा होता है, और यह राजस्व न्यायालयों के क्षेत्राधिकार में आता है — सिविल न्यायालय के नहीं। खातेदारी भूमि का बँटवारा करने वाली सिविल न्यायालय की डिक्री गंभीर क्षेत्राधिकार-आपत्ति के अधीन रहती है।
सही न्यायालय: खातेदारी भूमि के बँटवारे का दावा प्रथमतः उपखंड अधिकारी (SDO) के समक्ष प्रस्तुत होता है। यह राजस्थान की संपत्ति-मुकदमेबाज़ी की सबसे सामान्य भूल है — कृषि भूमि हेतु सिविल न्यायालय में बँटवारे का वाद दायर कर देना। मकान/शहरी भूखंड हेतु सिविल न्यायालय, परंतु खातेदारी कृषि भूमि हेतु राजस्व न्यायालय सही मंच है।
प्रक्रिया: उपखंड अधिकारी हिस्सेदारों एवं हिस्सों का निर्धारण करता है, राजस्व अभिलेखों (जमाबंदी) की जाँच करता है, और भूमि का हदबंदी द्वारा विभाजन कराकर पृथक् खातों में नामांतरण का आदेश देता है। जहाँ टाइटल ही विवादित हो (केवल हिस्से नहीं), वहाँ पहले सिविल न्यायालय में स्वामित्व का निर्धारण आवश्यक हो सकता है, फिर राजस्व न्यायालय बँटवारा करता है।
विनीता शर्मा (2020) के बाद यह सुस्पष्ट है कि बेटी को कृषि भूमि में भी पुत्र के समान हिस्सा प्राप्त है। अतः खातेदारी भूमि के बँटवारे में पुत्रियों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए; उन्हें छोड़कर किया गया बँटवारा चुनौती-योग्य होता है।
कई परिवार न्यायालय जाए बिना पारिवारिक समझौते या आपसी सहमति से कृषि भूमि का बँटवारा कर लेते हैं, जिसे राजस्व अभिलेखों में नामांतरित करा लिया जाता है। एक न्यायसंगत एवं सद्भावपूर्ण पारिवारिक समझौता आबद्धकारी होता है तथा लंबी मुकदमेबाज़ी से बचाता है; तथापि भविष्य के विवाद टालने हेतु इसे लिखित/पंजीकृत एवं अभिलेखों में अद्यतन कराना श्रेयस्कर है।
उपखंड अधिकारी के बँटवारा आदेश से असंतुष्ट पक्ष राजस्व पदानुक्रम में क्रमशः अपील कर सकता है, और अंततः राजस्व मंडल, अजमेर तक। मंडल के निर्णय की समीक्षा केवल राजस्थान उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226/227 के अंतर्गत होती है। चूँकि क्षेत्राधिकार एवं अभिलेखों का सूक्ष्म विश्लेषण आवश्यक होता है, विशिष्ट मामले में अधिवक्ता से परामर्श उचित है।