संपत्ति विधि

बेटी का पैतृक संपत्ति में अधिकार: विनीता शर्मा निर्णय के बाद की स्थिति

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6 (2005 संशोधन) और विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) के अनुसार बेटी जन्म से ही पैतृक/सहदायिकी (coparcenary) संपत्ति में पुत्र के समान सहदायिक है। यह अधिकार जन्मसिद्ध है — इसके लिए 9 सितंबर 2005 को पिता का जीवित होना आवश्यक नहीं, और विवाह से यह अधिकार समाप्त नहीं होता।

एक नज़र में
  • सहदायिक अधिकार — बेटी जन्म से पुत्र के समान सहदायिक (coparcener); धारा 6, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (2005 संशोधन)
  • अग्रणी निर्णय — विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020): अधिकार जन्मसिद्ध, 9 सितंबर 2005 को पिता का जीवित होना आवश्यक नहीं
  • विवाहित बेटी — विवाह से हिस्सा न कम होता है, न समाप्त
  • कृषि भूमि — राजस्थान में खातेदारी भूमि में भी समान हिस्सा; नामांतरण एवं राजस्व न्यायालय में बँटवारा
  • अपवाद — 20 दिसंबर 2004 से पूर्व का पंजीकृत बँटवारा या न्यायालय-डिक्री से हुआ विभाजन संरक्षित
  • मंच (forum) — बँटवारे का वाद सिविल न्यायालय में; कृषि भूमि हेतु राजस्व न्यायालय

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 एक केंद्रीय कानून है और पूरे भारत में समान रूप से लागू होता है — यह सभी हिंदू, बौद्ध, जैन एवं सिख परिवारों पर लागू होता है। 2005 संशोधन ने कृषि भूमि से जुड़ी पुरानी राज्य-अपवाद व्यवस्था (धारा 4(2)) को भी हटा दिया। नीचे दिए गए राजस्थान/जोधपुर के उदाहरण केवल दृष्टांत हैं; कानून वही रहता है। फ़ोन/वीडियो परामर्श राजस्थान के बाहर के मुवक्किलों के लिए भी उपलब्ध है।

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Pita Ki Sampatti Me Beti Ka Haq — Puri Process | Vineeta Sharma 2020 Ke Baad

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में वर्ष 2005 के संशोधन ने पुत्रियों को सहदायिकी (coparcenary) संपत्ति में पुत्रों के समान अधिकार दिया। संशोधित धारा 6 के अनुसार, सहदायिक की पुत्री जन्म से ही उसी प्रकार सहदायिक बन जाती है जैसे पुत्र, और उसके वही अधिकार एवं दायित्व होते हैं। यह अधिकार पैतृक संपत्ति, कृषि भूमि तथा संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति पर समान रूप से लागू होता है।

वर्षों तक यह प्रश्न विवादित रहा कि क्या यह अधिकार केवल तभी मिलेगा जब 2005 में पिता जीवित हो। उच्चतम न्यायालय की तीन-न्यायाधीशीय पीठ ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) में निर्णायक रूप से स्पष्ट किया कि बेटी का सहदायिक अधिकार जन्म से उत्पन्न होता है और यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि 9 सितंबर 2005 को पिता जीवित था या नहीं। अर्थात् पिता का जीवित होना आवश्यक नहीं — अधिकार जन्मसिद्ध है।

विवाह से अधिकार समाप्त नहीं होता। एक विवाहित बेटी भी समान सहदायिक बनी रहती है और पैतृक संपत्ति के बँटवारे की माँग कर सकती है। विवाह के कारण उसका हिस्सा न तो कम होता है और न समाप्त — यह एक व्यापक किंतु ग़लत धारणा है।

राजस्थान में बेटी को कृषि भूमि (खातेदारी) में भी पुत्र के समान हिस्सा प्राप्त है। विनीता शर्मा के पश्चात् यह स्थिति और स्पष्ट हुई है। बेटी राजस्व अभिलेखों में अपने हिस्से के नामांतरण की माँग कर सकती है तथा आवश्यकता होने पर राजस्व न्यायालय में बँटवारे का दावा प्रस्तुत कर सकती है।

अधिकार का दावा कैसे करें: बेटी संबंधित संपत्ति का बँटवारा माँगते हुए सिविल न्यायालय में बँटवारे का वाद (कृषि भूमि हेतु राजस्व न्यायालय में) प्रस्तुत कर सकती है, और अपने हिस्से की घोषणा एवं भौतिक पृथक्करण की प्रार्थना कर सकती है। यदि अन्य सह-हिस्सेदारों ने उसके हिस्से से इनकार करते हुए संपत्ति बेच दी हो, तो वह उस अंतरण को अपने अविभाजित हित की सीमा तक चुनौती दे सकती है।

कुछ अपवाद ध्यान योग्य हैं: 20 दिसंबर 2004 से पूर्व हुए पंजीकृत बँटवारे या न्यायालय-डिक्री से तय विभाजन संरक्षित हैं, और स्वअर्जित संपत्ति का स्वामी अपनी इच्छानुसार वसीयत कर सकता है (उस पर जन्मसिद्ध अधिकार नहीं)। बँटवारे या उत्तराधिकार के दावे में परिसीमा एवं तथ्यों की भूमिका होती है, अतः विशिष्ट मामले में अधिवक्ता से परामर्श उचित है।

जब बेटी स्वयं विदेश में रहती हो, तो हिस्सा प्रायः इसलिए संकट में नहीं आता कि अधिकार कमज़ोर है, बल्कि इसलिए कि नामांतरण और बँटवारा उसकी अनुपस्थिति में तय हो जाता है। ऐसी स्थिति में विशेष मुख्तारनामा (special power of attorney) और परिसीमा की अवधि निर्णायक हो जाती है — देखें विदेश में रहते हुए राजस्थान की विरासती भूमि को सुरक्षित रखना (English)

यह लेख केवल सामान्य जानकारी हेतु है और इसे विधिक परामर्श नहीं माना जाए। अपने विशिष्ट मामले में मार्गदर्शन हेतु किसी योग्य अधिवक्ता से परामर्श करें।
शुभम ओझा एवं एसोसिएट्स
अधिवक्ता, राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर  ·  दूरभाष: +91 70230 51275  ·  WhatsApp

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