बैंक का SARFAESI नोटिस — यानी धारा 13(2) का माँग-नोटिस — मिलने पर आपके पास 60 दिन होते हैं। इसी दौरान धारा 13(3A) में लिखित आपत्ति दें, जिसका जवाब बैंक को 15 दिन में देना पड़ता है। 60 दिन बाद बैंक धारा 13(4) में कब्ज़ा ले सकता है; इसके विरुद्ध असली उपाय है DRT में धारा 17 की अर्ज़ी — कार्रवाई से 45 दिन के भीतर।
SARFAESI का नोटिस आते ही ज़्यादातर लोग दो में से एक गलती करते हैं — या तो घबराकर कुछ नहीं करते, या सोचते हैं "देखा जाएगा"। दोनों महँगी पड़ती हैं, क्योंकि इस कानून में हर चीज़ की घड़ी चलती है। पूरा नाम है Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act, 2002। इसकी खासियत यही है कि यह बैंक को अदालत गए बिना, सीधे गिरवी संपत्ति पर कार्रवाई की ताकत देता है — और इसी ताकत का संतुलन आपके सख्त समय-सीमा वाले अधिकारों से बनता है।
सबसे पहले यह जाँचिए कि SARFAESI आप पर लागू होता भी है या नहीं। दो अहम अपवाद हैं। पहला — अगर लोन unsecured है (कोई property, plot, दुकान या stock गिरवी नहीं), तो SARFAESI लागू ही नहीं होता; बैंक को civil suit या arbitration का रास्ता लेना पड़ता है। दूसरा, और राजस्थान के लिए बेहद अहम — धारा 31(i) के तहत कृषि भूमि इस कानून से बाहर है। खेती की ज़मीन पर बैंक SARFAESI से कब्ज़ा नहीं ले सकता। पर सावधानी: केवल राजस्व रिकॉर्ड में "कृषि" लिखा होना काफी नहीं — न्यायालय ज़मीन का वास्तविक उपयोग देखता है। यह अपवाद मैंने कई मामलों में निर्णायक बनते देखा है, पर उसे प्रमाण से खड़ा करना पड़ता है।
यह नोटिस तब आता है जब आपका खाता RBI के मानकों के अनुसार NPA (Non-Performing Asset) घोषित हो चुका होता है। धारा 13(2) के तहत बैंक आपको 60 दिन देता है पूरा बकाया चुकाने के लिए। यह अंत नहीं है — यह पहला पड़ाव है। इन 60 दिनों में जो आप करते हैं (या नहीं करते), वही आगे की पूरी लड़ाई की दिशा तय करता है।
इसी 60 दिन की अवधि में आपके पास धारा 13(3A) का अधिकार है — बैंक को लिखित objection/representation देने का। और बैंक की कानूनी duty है कि आपकी आपत्ति पर reasoned जवाब 15 दिन के भीतर दे। मैंने बहुत से मामलों में देखा है कि बैंक यह जवाब देता ही नहीं, या केवल औपचारिकता निभाता है — और यही आगे DRT में एक मज़बूत ground बन जाता है। इसके उलट, जो borrower चुप रह जाता है, वह अपना सबसे आसान हथियार खुद फेंक देता है। आपत्ति सोच-समझकर, तथ्यों के साथ, समय पर दीजिए।
60 दिन पूरे होते ही बैंक धारा 13(4) के तहत कदम उठा सकता है। पहले आता है symbolic possession (कागज़ी कब्ज़ा), फिर physical possession। भौतिक कब्ज़े के लिए बैंक प्रायः धारा 14 के तहत जिला मजिस्ट्रेट (या महानगरों में CMM) से आदेश लेता है — यह एक प्रशासनिक सहायता है, न्यायिक सुनवाई नहीं, इसलिए यहाँ आपकी दलील बहुत सीमित सुनी जाती है। इसके आगे नीलामी (auction) की प्रक्रिया शुरू होती है। कई लोग यहीं गलती करते हैं — physical possession के इंतज़ार में बैठे रहते हैं; असल में लड़ाई इससे पहले लड़नी होती है।
SARFAESI की धारा 13(4) की किसी भी कार्रवाई के विरुद्ध borrower का मुख्य remedy है DRT में धारा 17 की Securitisation Application (SA) — और वह भी कार्रवाई से 45 दिन के भीतर। यह limitation सख्त है, और मैंने यही चूक सबसे महँगी पड़ते देखी है। राजस्थान के सभी मामलों के लिए यह अर्ज़ी DRT जयपुर में लगती है। DRT यह देखता है कि बैंक की कार्रवाई में prima facie कोई खोट है या नहीं — जैसे 13(3A) के जवाब की अनदेखी, नोटिस में रकम का गलत या बिना-हिसाब दावा, या Rules 8-9 की प्रक्रिया का उल्लंघन। एक बात ईमानदारी से — stay अक्सर conditional मिलता है, यानी कुछ राशि जमा करने की शर्त पर; Tribunal का मकसद बैंक की वसूली रोकना नहीं, प्रक्रिया की वैधता जाँचना है। (और यदि DRT का आदेश खिलाफ जाए, तो DRAT में अपील पर statutory pre-deposit — 50%, जो घटकर 25% हो सकता है — अनिवार्य ही है।)
नीलामी से पहले Security Interest (Enforcement) Rules के Rule 8 और 9 बैंक पर सख्त प्रक्रिया लगाते हैं — सही valuation, reserve price, और कम-से-कम 30 दिन का public sale notice। इनमें defect मिलना बहुत आम है, और यही DRT में नीलामी रुकवाने के सबसे कामयाब grounds हैं। पर एक बदलाव समझ लीजिए: 2016 के संशोधन के बाद धारा 13(8) कड़ी हो गई है, और Supreme Court ने Celir LLP v. Bafna Motors (2023) में साफ कर दिया कि auction notice प्रकाशित होते ही borrower का redemption right समाप्त। यानी "नीलामी के दिन पैसा लेकर पहुँच जाएँगे" वाली पुरानी सोच अब कानूनन नहीं चलती — पूरा बकाया चुकाकर संपत्ति छुड़ानी है, तो notice छपने से पहले।
एक सवाल अक्सर आता है — "क्या हम दीवानी न्यायालय (Civil Court) में injunction ले लें?" व्यावहारिक जवाब: नहीं। SARFAESI की धारा 34 ऐसे मामलों में Civil Court का दरवाज़ा लगभग बंद कर देती है, सिवाय fraud जैसी बहुत सीमित स्थितियों के। इसी तरह High Court में writ भी केवल exceptional cases में टिकती है — वरना "alternative remedy available" कहकर खारिज हो जाती है। कानून ने मंच बाँट रखा है: secured loan और SARFAESI का विवाद = DRT का रास्ता। गलत मंच चुनना सिर्फ़ कीमती समय गँवाना है।
अंत में एक व्यावहारिक सलाह जो हर मुवक्किल को देता हूँ — नोटिस मिलते ही सारे loan documents, account statements और बैंक से हुई हर चिट्ठी एक file में लगाइए। DRT में केस दलील से नहीं, दस्तावेज़ से लड़ा जाता है। और सबसे बड़ी बात: नोटिस को अनदेखा करना कोई रणनीति नहीं है — यह सिर्फ़ अपने विकल्प घटाना है। इस क्षेत्र में देरी ही सबसे बड़ा नुकसान है।