जोधपुर में ज़मानत की प्रक्रिया: सेशन कोर्ट से राजस्थान हाईकोर्ट तक
जोधपुर में जब किसी की गिरफ़्तारी होती है — या होने का डर होता है — तो परिवार के पहले कुछ घंटे तीन ही सवालों में बीत जाते हैं: कौन-सी अदालत, कितना समय, और क्या-क्या लगेगा।
राजस्थान उच्च न्यायालय और यहाँ की सेशन अदालतों में ज़मानत के मामलों में पैरवी करते हुए मैंने पाया है कि तीनों सवालों का ईमानदार जवाब एक ही है — यह इस पर निर्भर करता है कि आप चार में से किस दरवाज़े के सामने खड़े हैं। यह पृष्ठ वही चार दरवाज़े समझाता है, ताकि परिवार पहली मुलाकात में ही यह जानकर आए कि उसका मामला किस श्रेणी में आता है।
ज़मानत के चार रास्ते, और हर एक कहाँ लगता है
नियमित ज़मानत — BNSS 2023 की धारा 483 (पुरानी धारा 439 CrPC) — उस व्यक्ति के लिए है जो पहले से हिरासत में है। जोधपुर में क्रम लगभग हमेशा यही रहता है: पहले सेशन न्यायालय, क्योंकि बेंच यह अपेक्षा करती है कि वह उपाय पहले आज़माया जाए, और उसके बाद ही उच्च न्यायालय। दूसरा आवेदन पहले की नक़ल नहीं होता — उच्च न्यायालय यह जानना चाहता है कि सेशन न्यायाधीश ने क्या माना और वह तर्क क्यों नहीं टिकता। नियमित, अंतरिम और सांविधिक ज़मानत का अंतर विस्तार से ज़मानत के प्रकार और प्रक्रिया वाले लेख में देखा जा सकता है।
अग्रिम ज़मानत — धारा 482 BNSS (पुरानी धारा 438 CrPC) — उसके लिए है जिसे गिरफ़्तारी की आशंका है। सेशन न्यायालय और उच्च न्यायालय, दोनों को इसका अधिकार है। यहाँ समय का महत्व लोग जितना समझते हैं उससे कहीं ज़्यादा है — गुरबख़्श सिंह सिब्बिया के फ़ैसले के बाद FIR का दर्ज होना भी पूर्व-शर्त नहीं, पर आशंका ठोस होनी चाहिए। व्यवहार में जोधपुर बेंच के सामने वह आवेदन तेज़ चलता है जिसके साथ धारा 35 BNSS का नोटिस या लिखित परिवाद की प्रति लगी हो, बजाय उसके जो सुनी-सुनाई बात पर खड़ा हो।
डिफ़ॉल्ट ज़मानत — धारा 187(2) BNSS — वह उपाय है जिसके बारे में परिवारों को लगभग कभी पता नहीं होता। यदि पहली रिमांड से 60 या 90 दिन में (अवधि अपराध पर निर्भर है) चालान दाखिल नहीं हुआ, तो रिहाई विवेक का नहीं, अधिकार का प्रश्न बन जाती है। पर यह अधिकार चालान पेश होने से पहले माँगना पड़ता है — जिस दिन पुलिस चालान पेश कर देती है, खिड़की बंद हो जाती है। हिरासत के हर मामले में मैं 60वें और 90वें दिन की तारीख़ अलग लिखकर रखता हूँ, और मेरी सलाह यही रहती है कि परिवार पहले ही दिन अपने वकील से ये दो तारीख़ें पूछ ले।
विशेष अधिनियमों की ज़मानत अपने आप में अलग दुनिया है। NDPS के मामलों में धारा 37 की दोहरी शर्तें commercial quantity में स्वतंत्रता के सामान्य अनुमान को ही पलट देती हैं, और व्यावहारिक बचाव प्रायः प्रक्रिया की चूकों में मिलता है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के मामलों में तो नई ज़मानत अर्ज़ी चलती ही नहीं — विशेष न्यायालय के इनकार के विरुद्ध उपाय धारा 14A(2) की अपील है, जिस पर 90 दिन की परिसीमा है (अधिकतम 180 दिन)। यहाँ ग़लत दरवाज़ा चुनना सिर्फ़ समय बर्बाद नहीं करता — वह सही दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद कर सकता है।
अदालत असल में क्या तौलती है
सैकड़ों आदेशों में वही कारक बार-बार लौटते हैं: अपराध की गंभीरता और FIR में बताई गई विशिष्ट भूमिका, जाँच की अवस्था, पुराना आपराधिक रिकॉर्ड, गवाहों को प्रभावित करने का ख़तरा, और parity — यानी क्या समान भूमिका वाले सह-अभियुक्त को पहले ज़मानत मिल चुकी है। Parity का तर्क हर जगह ढीले-ढाले ढंग से उठाया जाता है, पर जोधपुर बेंच में यह तभी चलता है जब भूमिकाएँ FIR की अपनी भाषा में सचमुच मिलती हों। अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य के बाद सात वर्ष तक की सज़ा वाले अपराधों में गिरफ़्तारी स्वतः नहीं होती; हैरानी की बात है कि कितने ही मामले बेवजह गिरफ़्तारी के बाद लड़ने के बजाय धारा 35 BNSS के नोटिस की अवस्था पर ही सँभल जाते हैं। गिरफ़्तारी होने की स्थिति में गिरफ़्तारी के बाद के अधिकार जान लेना पहले घंटे में सबसे काम आता है। और जहाँ FIR स्वयं प्रक्रिया का दुरुपयोग हो, वहाँ उपाय ज़मानत नहीं बल्कि धारा 528 BNSS के अंतर्गत FIR रद्द कराना होता है।
पहली मुलाकात से पहले परिवार कौन-से कागज़ जुटाए
- FIR संख्या और सम्बन्धित पुलिस थाना
- गिरफ़्तारी हो चुकी हो तो arrest memo और रिमांड आदेश
- पहले के ज़मानत आदेश — सेशन का इनकार आदेश भी
- स्वास्थ्य का आधार हो तो चिकित्सा दस्तावेज़
- स्थायित्व का प्रमाण — नौकरी, संपत्ति, आश्रित
- प्रस्तावित ज़मानतियों के पहचान एवं पते के प्रमाण
उच्च न्यायालय की अवस्था में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ सेशन का इनकार आदेश होता है, क्योंकि उच्च न्यायालय मामले को उसी तर्क के सामने रखकर पढ़ता है। ज़मानत के मामलों में आधी देरी इसी एक कारण से होती है कि कागज़ ड्राफ़्ट बनने से पहले नहीं, बाद में आते हैं।
समय-सीमा — जैसी सच में है
जोधपुर में सेशन की ज़मानत अर्ज़ी प्रायः दाखिल होने के कुछ ही दिनों में सुनवाई पर आ जाती है। उच्च न्यायालय में listing सम्बन्धित बेंच की cause-list के दबाव पर निर्भर करती है; वास्तविक तात्कालिकता के लिए urgent mentioning का रास्ता खुला है। अग्रिम ज़मानत भी लगभग इसी गति से चलती है। डिफ़ॉल्ट ज़मानत, यदि 61वें या 91वें दिन सही ढंग से माँगी जाए, सबसे तेज़ तय होती है — क्योंकि उसमें बहस के लिए बचता ही कुछ नहीं।
जो सवाल सबसे ज़्यादा पूछे जाते हैं
सेशन कोर्ट ने ज़मानत ख़ारिज कर दी — क्या अब हाईकोर्ट में कोई गुंजाइश नहीं?
ऐसा नहीं है। सेशन का इनकार एक पड़ाव है, अंत नहीं। उच्च न्यायालय धारा 483 BNSS के अंतर्गत मामले को नए सिरे से देखता है, और parity, बदली हुई परिस्थितियाँ या जाँच पूरी हो जाना — ये आधार सेशन के इनकार के बाद भी प्रायः सफल होते हैं।
क्या FIR दर्ज होने से पहले भी अग्रिम ज़मानत माँगी जा सकती है?
हाँ। गुरबख़्श सिंह सिब्बिया के बाद FIR का दर्ज होना पूर्व-शर्त नहीं है — गिरफ़्तारी की ठोस आशंका पर्याप्त है, बशर्ते आवेदन यह दिखा सके कि आशंका वास्तविक है, कल्पना नहीं।
60 या 90 दिन में चालान नहीं आया — अब क्या?
तुरंत धारा 187(2) BNSS के अंतर्गत डिफ़ॉल्ट ज़मानत का आवेदन दीजिए। यह अक्षुण्ण अधिकार है, पर केवल तब तक जब तक चालान दाखिल न हो जाए। आवेदन देना पड़ता है, और समय पर — अदालत यह अपने आप नहीं देती।
SC/ST एक्ट में विशेष न्यायालय ने इनकार कर दिया — नियमित ज़मानत अर्ज़ी लगेगी?
नहीं। उपाय अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 14A(2) की अपील है, धारा 483 BNSS का आवेदन नहीं, और उस पर 90 दिन की परिसीमा है (अधिकतम 180 दिन)। यह इस क्षेत्र की सबसे आम और सबसे महँगी चूक है।
मकान नं. 245, सरदार क्लब के सामने, रातानाडा, जोधपुर 342001
+91 70230 51275 · shubham@shubhamojhaandassociates.com · WhatsApp
कार्यालय समय: रविवार–गुरुवार एवं शनिवार, सायं 7–11 बजे (शुक्रवार अवकाश)