पारिवारिक विधि

गुजारा भत्ता (भरण-पोषण) — BNSS धारा 144 में कितना और कब से मिलता है

Family Court के बाहर जो सवाल मुझसे सबसे ज़्यादा पूछा जाता है, वह कानून की किताब का नहीं होता। सवाल दो ही होते हैं — कितना मिलेगा, और कब से मिलेगा। भरण-पोषण यानी maintenance का कानून पहले CrPC की धारा 125 में था; अब वही व्यवस्था भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 144 में है। पुराने अधिकार जस के तस बने हुए हैं। और एक बात शुरू में ही साफ कर दूँ — यह provision किसी एक धर्म का नहीं है। हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी — personal law चाहे जो हो, धारा 144 सब पर लागू होती है, क्योंकि इसका मकसद religious नहीं, social है: किसी को बेसहारा न छोड़ा जाए।

कौन मांग सकता है? लोग समझते हैं कि यह सिर्फ पत्नी का remedy है। ऐसा नहीं है। पत्नी — जिसमें तलाकशुदा पत्नी भी शामिल है, जब तक वह पुनर्विवाह न कर ले — पति से भरण-पोषण मांग सकती है। नाबालिग बच्चे, चाहे वैध हों या अवैध, पिता से। वह वयस्क संतान भी जो शारीरिक या मानसिक अक्षमता के कारण खुद को maintain नहीं कर सकती। और माता-पिता अपने बेटे से ही नहीं, बेटी से भी भरण-पोषण मांग सकते हैं — यह बात बहुत कम परिवारों को पता है। मुस्लिम महिलाओं के लिए Supreme Court ने Mohd. Abdul Samad v. State of Telangana (2024) में स्थिति साफ कर दी: 1986 का Muslim Women Act रास्ता नहीं रोकता, धारा 144 का remedy उन्हें भी उपलब्ध है।

अब असली लड़ाई की बात। मैंने देखा है कि maintenance के मुकदमों में निर्णायक मोड़ final order नहीं, interim maintenance होता है — यानी case चलने के दौरान का अंतरिम खर्चा। मुकदमे बरसों चलते हैं; interim ही उस दौरान परिवार का सहारा होता है। BNSS की धारा 144(2) कहती है कि interim की application first hearing से 60 दिन के भीतर तय हो। इसी जगह Supreme Court का Rajnesh v. Neha का फैसला पूरा खेल बदलता है — दोनों पक्षों को अपनी आय, संपत्ति और देनदारियों का Affidavit of Assets and Liabilities file करना अनिवार्य है। यह affidavit ही आधी लड़ाई है। जो पक्ष इसे लापरवाही से भरता है, वह अपना case खुद कमज़ोर करता है।

कितना मिलेगा? धारा 144 में कोई fixed formula या cap नहीं है। Court जो देखती है: पति की वास्तविक आय — सिर्फ salary slip नहीं, बल्कि जीवन-शैली से झलकती आय भी। गाड़ी, मकान, बच्चों के स्कूल की fees, शादी-समारोह के खर्चे — इनसे court आय का अनुमान लगा सकती है, भले ही कागज़ पर आय कम दिखाई गई हो। Court कागज़ नहीं, lifestyle देखती है। साथ में पत्नी की उचित ज़रूरतें, वैवाहिक जीवन का standard of living, और पति पर आश्रित अन्य लोग। एक आम गलतफहमी यह भी दूर कर दूँ — कमाने वाली पत्नी का claim खत्म नहीं होता। अगर उसकी आय उसकी ज़रूरतों के लिए अपर्याप्त है, तो अंतर की भरपाई का order हो सकता है।

कब से मिलेगा — यह सवाल जितना सीधा लगता है, व्यवहार में उतना ही अहम है। Rajnesh v. Neha के बाद नियम एक है: भरण-पोषण application की तारीख से देय होता है, order की तारीख से नहीं। मतलब यह कि देर से order आने का फायदा टाल-मटोल करने वाले पक्ष को नहीं मिलता; arrears पहले दिन से जुड़ते रहते हैं। इसीलिए मेरा सीधा सुझाव रहता है — हालात बनते ही application दाखिल करें, तारीख से ही आपका हक गिनना शुरू हो जाता है।

और अगर order के बाद भी भुगतान न हो? धारा 144(3) यहाँ काम आती है। Magistrate warrant जारी कर सकता है — चल संपत्ति की कुर्की और बिक्री तक — और उसके बाद भी default जारी रहे तो हर महीने के default पर एक महीने तक की कैद। Jodhpur की courts में recovery के ये proceedings रोज़ चलते हैं, और कैद का डर अक्सर वह काम कर देता है जो notice नहीं कर पाता। पर एक limitation ध्यान रखें: warrant की application उस राशि के due होने से एक साल के भीतर देनी होती है। पुराना बकाया जमा होने देना और फिर एकमुश्त वसूली सोचना — यह रणनीति उलटी पड़ सकती है।

पति के पक्ष की भी सुन लीजिए, क्योंकि दोनों तरफ के मुवक्किल मेरे पास आते हैं। बचाव के रास्ते सीमित पर वास्तविक हैं — अगर पत्नी बिना पर्याप्त कारण के अलग रह रही हो, या आपसी सहमति से अलग रहने का समझौता हो, तो claim पर असर पड़ता है। कई बार पति को order की खबर ही तब लगती है जब recovery warrant आता है — ex-parte order ऐसे भी होते हैं। ऐसे में उचित कारण दिखाकर order को set aside कराने का रास्ता खुला है, पर देरी हर दिन महंगी पड़ती है। और परिस्थितियाँ बदलें — नौकरी छूटे, आय घटे-बढ़े — तो धारा 144(4) में order में बदलाव की application दोनों पक्ष कर सकते हैं। किसी भी तरफ हों, दस्तावेज़ ही आपकी असली ताकत हैं: आय के प्रमाण, bank statements, खर्चों का हिसाब। Affidavit सोच-समझकर, सच्चाई से भरिए।

यह लेख केवल सामान्य जानकारी हेतु है और इसे विधिक परामर्श नहीं माना जाए। अपने विशिष्ट मामले में मार्गदर्शन हेतु किसी योग्य अधिवक्ता से परामर्श करें।
शुभम ओझा एवं एसोसिएट्स
अधिवक्ता, राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर  ·  दूरभाष: +91 70230 51275  ·  WhatsApp

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