सिविल पक्ष की सबसे आम मियादें ये हैं — उच्च न्यायालय में CPC की अपील नब्बे दिन (अनुच्छेद 116(a)), ex parte डिक्री रद्द कराने की अर्ज़ी तीस दिन (अनुच्छेद 123), मालिकाना हक़ पर कब्ज़े का वाद बारह वर्ष (अनुच्छेद 65), और डिक्री का execution बारह वर्ष (अनुच्छेद 136)। पर अवधि आधी कहानी है; गिनती कहाँ से शुरू होगी, यह धारा 12(2) तय करती है।
मुवक्किल जब फ़ाइल लेकर आता है तो पहला सवाल मुद्दे का नहीं होता, तारीख़ का होता है। जोधपुर में मेरे पास आने वाले मामलों में जो सबसे ज़्यादा नुकसान करती है वह कोई कमज़ोर दलील नहीं, बल्कि यह मान लेना है कि "अभी तो समय है"। इसीलिए यह पन्ना बनाया — परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) की अनुसूची के वे अनुच्छेद एक जगह, जो व्यवहार में बार-बार काम आते हैं। हर पंक्ति bare Act से मिलाकर लिखी गई है; नीचे वाले खाने में खोजिए — हिंदी में भी और अंग्रेज़ी में भी (जैसे appeal, ex parte, possession, execution)।
| कार्रवाई | अनुच्छेद | अवधि | गिनती किस दिन से |
|---|---|---|---|
| वाद (Suits) | |||
| अनुबंध के विशिष्ट पालन (specific performance) का वाद | 54 | तीन वर्ष | पालन के लिए नियत तारीख़; और यदि कोई तारीख़ नियत न हो तो जब वादी को यह जानकारी हो जाए कि पालन से इनकार कर दिया गया है |
| कोई अन्य घोषणा (declaration) प्राप्त करने का वाद | 58 | तीन वर्ष | जब वाद लाने का अधिकार पहली बार उत्पन्न होता है |
| किसी विलेख या डिक्री को रद्द कराने, या संविदा के विखंडन (rescission) का वाद | 59 | तीन वर्ष | जब वे तथ्य पहली बार वादी की जानकारी में आते हैं, जिनके आधार पर वह उसे रद्द कराने का हक़दार है |
| किस्तों में देय promissory note या bond पर वाद | 36 | तीन वर्ष | उस समय जब पहली किस्त की अवधि समाप्त होती है (उतने भाग के लिए); शेष भागों के लिए उनकी अपनी-अपनी किस्तों की अवधि समाप्त होने पर |
| किस्तों वाला promissory note या bond, जिसमें शर्त हो कि एक किस्त की चूक पर पूरी रकम देय हो जाएगी | 37 | तीन वर्ष | जब चूक (default) होती है — सिवाय उस स्थिति के जहाँ payee या obligee उस शर्त का लाभ छोड़ दे, और तब अगली ऐसी चूक से जिस पर कोई छूट न दी गई हो |
| maker द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति को दिया गया promissory note, जो किसी घटना के बाद payee को सौंपा जाना हो | 38 | तीन वर्ष | payee को सौंपे जाने की तारीख़ |
| अचल संपत्ति के कब्ज़े का वाद, जो पूर्व कब्ज़े पर आधारित हो, हक़ (title) पर नहीं, जहाँ वादी कब्ज़े में रहते हुए बेदखल कर दिया गया हो | 64 | बारह वर्ष | बेदखली (dispossession) की तारीख़ |
| हक़ (title) के आधार पर अचल संपत्ति या उसमें किसी हित के कब्ज़े का वाद | 65 | बारह वर्ष | जब प्रतिवादी का कब्ज़ा वादी के विरुद्ध प्रतिकूल (adverse) हो जाता है |
| ऐसा कोई भी वाद जिसके लिए अनुसूची में कहीं और अवधि न दी गई हो | 113 | तीन वर्ष | जब वाद लाने का अधिकार उत्पन्न होता है |
| अपील (Appeals) | |||
| CPC, 1908 के अधीन किसी डिक्री या आदेश से उच्च न्यायालय में अपील | 116(a) | नब्बे दिन | डिक्री या आदेश की तारीख़ |
| CPC, 1908 के अधीन किसी डिक्री या आदेश से किसी अन्य न्यायालय में अपील | 116(b) | तीस दिन | डिक्री या आदेश की तारीख़ |
| किसी उच्च न्यायालय की डिक्री या आदेश से उसी न्यायालय में अपील | 117 | तीस दिन | डिक्री या आदेश की तारीख़ |
| अर्ज़ियाँ (Applications) | |||
| संक्षिप्त प्रक्रिया (summary procedure) वाले वाद में उपस्थित होकर बचाव करने की अनुमति के लिए अर्ज़ी | 118 | दस दिन | जब समन तामील होता है |
| अनुपस्थिति, अभियोजन में चूक, तामील का ख़र्च न देने या प्रतिभूति न देने के कारण खारिज हुए वाद, अपील, पुनर्विलोकन या पुनरीक्षण की बहाली की अर्ज़ी | 122 | तीस दिन | खारिज होने की तारीख़ |
| ex parte पारित डिक्री को अपास्त कराने, या ex parte सुनी गई अपील की पुनः सुनवाई की अर्ज़ी | 123 | तीस दिन | डिक्री की तारीख़; और जहाँ समन या नोटिस विधिवत तामील न हुआ हो, वहाँ उस दिन से जब आवेदक को डिक्री की जानकारी हुई। स्पष्टीकरण — CPC के आदेश 5 नियम 20 की substituted service विधिवत तामील नहीं मानी जाएगी |
| उच्चतम न्यायालय से भिन्न किसी न्यायालय द्वारा निर्णय के पुनर्विलोकन (review) की अर्ज़ी | 124 | तीस दिन | डिक्री या आदेश की तारीख़ |
| डिक्री के निष्पादन में हुई बिक्री (sale in execution) को अपास्त कराने की अर्ज़ी, जिसमें निर्णीत-ऋणी द्वारा दी गई ऐसी अर्ज़ी भी शामिल है | 127 | साठ दिन | बिक्री की तारीख़ |
| ऐसे व्यक्ति द्वारा कब्ज़े की अर्ज़ी जो अचल संपत्ति से बेदखल हुआ हो और डिक्रीदार या निष्पादन-बिक्री के क्रेता का हक़ चुनौती दे रहा हो | 128 | तीस दिन | बेदखली की तारीख़ |
| किसी सिविल न्यायालय की डिक्री (अनिवार्य निषेधाज्ञा वाली डिक्री को छोड़कर) या आदेश के निष्पादन की अर्ज़ी | 136 | बारह वर्ष | जब डिक्री या आदेश प्रवर्तनीय (enforceable) होता है; और जहाँ डिक्री या कोई बाद का आदेश किसी नियत तारीख़ पर या आवर्ती अवधियों पर धन या संपत्ति देने का निर्देश दे, वहाँ उस चूक की तारीख़ से जिसके लिए निष्पादन माँगा गया है |
| ऐसी कोई भी अन्य अर्ज़ी जिसके लिए इस खंड में कहीं और अवधि न दी गई हो | 137 | तीन वर्ष | जब अर्ज़ी देने का अधिकार उत्पन्न होता है |
अपील की अवधि निर्णय के दिन से नहीं गिनी जाती। धारा 12(1) कहती है कि जिस दिन से अवधि गिननी है वह दिन स्वयं छोड़ा जाएगा; और धारा 12(2) आगे जोड़ती है कि अपील, अपील की अनुमति, पुनरीक्षण या पुनर्विलोकन की गणना में निर्णय सुनाए जाने का दिन और डिक्री, दंडादेश या आदेश की नक़ल पाने में लगा अपेक्षित समय (time requisite) — दोनों बाहर रखे जाएँगे। धारा 12(3) के तहत निर्णय की नक़ल का समय भी बाहर रहता है। पर इसका स्पष्टीकरण उतना ही अहम है: नक़ल के लिए अर्ज़ी देने से पहले न्यायालय ने डिक्री तैयार करने में जो समय लिया, वह इस छूट में नहीं गिना जाएगा। व्यावहारिक निष्कर्ष सीधा है — निर्णय होते ही नक़ल की अर्ज़ी लगा दीजिए, क्योंकि छूट उसी दिन से चलनी शुरू होती है।
धारा 4 कहती है कि यदि निर्धारित अवधि उस दिन समाप्त हो रही हो जब न्यायालय बंद है, तो वाद, अपील या अर्ज़ी अगले खुले दिन दायर की जा सकती है — और इसका स्पष्टीकरण न्यायालय को उस दिन बंद मानता है जिस दिन वह अपने सामान्य कार्य-समय के किसी भी हिस्से में बंद रहा हो। राजस्थान उच्च न्यायालय की जोधपुर पीठ में यह गणना दीपावली और ग्रीष्मावकाश के आसपास हर साल काम आती है, पर इस पर पहले से योजना बनाकर चलना ठीक नहीं; यह चूक की सुरक्षा है, अतिरिक्त समय नहीं।
धारा 5 के अंतर्गत कोई अपील या अर्ज़ी निर्धारित अवधि के बाद भी स्वीकार की जा सकती है, यदि अपीलार्थी या आवेदक न्यायालय को संतुष्ट कर दे कि समय पर न आने का sufficient cause था। दो सीमाएँ याद रखिए। पहली — यह धारा वादों पर लागू नहीं होती; धारा 3 के अनुसार अवधि बीत जाने पर दायर वाद खारिज होता ही है, भले प्रतिवादी ने परिसीमा की आपत्ति उठाई हो या नहीं। दूसरी — CPC के आदेश 21 के किसी प्रावधान के अधीन दी गई अर्ज़ी को धारा 5 से स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है, यानी निष्पादन की कार्यवाही में देरी की माफ़ी का यह रास्ता नहीं खुलता। और जहाँ धारा 5 लागू होती भी है, वहाँ अनुभव यही कहता है कि विलंब-माफ़ी की अर्ज़ी में हर दिन का हिसाब देना पड़ता है; "फ़ाइल दब गई थी" जैसी बात न्यायालय में नहीं चलती।
अधिनियम का सामान्य ढाँचा यह है कि अवधि बीतने पर उपाय (remedy) बंद होता है, अधिकार बना रहता है। संपत्ति के कब्ज़े के मामले में यह ढाँचा टूट जाता है। धारा 27 कहती है कि कब्ज़े का वाद लाने की निर्धारित अवधि समाप्त होते ही उस व्यक्ति का उस संपत्ति में अधिकार ही समाप्त हो जाता है। इसी कारण अनुच्छेद 64 और 65 की बारह वर्ष की अवधि को हल्के में लेना सबसे भारी पड़ता है — और इसीलिए, जब कोई पैतृक या साझा ज़मीन का मामला लेकर आता है, मैं सबसे पहले यह पूछता हूँ कि दूसरे पक्ष का कब्ज़ा कब से है और उस कब्ज़े का स्वरूप क्या रहा है। संबंधित पढ़ने के लिए: बँटवारे का वाद और नामांतरण एवं अपना खाता।
ऊपर की सूची सिविल पक्ष की है — वाद, CPC की अपीलें और अर्ज़ियाँ। दांडिक (criminal) मियादें यहाँ जानबूझकर नहीं रखी गईं: अनुसूची के अनुच्छेद 114, 115 और 131 अब भी दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 का उल्लेख करते हैं, और 2023 की नई संहिता के बाद उनका पठन अलग से जाँचने योग्य विषय है। विशेष कानूनों की अपनी अवधि इस अनुसूची से ऊपर चलती है — जैसे SARFAESI की धारा 17 में DRT जाने के लिए 45 दिन। ऐसे मामलों में उसी कानून की धारा देखिए, अनुसूची नहीं।
एक आख़िरी व्यावहारिक बात। परिसीमा का सवाल फ़ाइल के अंत में नहीं, पहले दिन देखा जाना चाहिए — क्योंकि इसका उत्तर बदल देता है कि कौन-सा उपाय बचा है और कौन-सा नहीं। यदि आपके पास डिक्री, आदेश या नोटिस की तारीख़ मौजूद है, तो गणना पंद्रह मिनट का काम है; और यदि तारीख़ें बिखरी हुई हैं, तो सबसे पहले उन्हें क्रम में लगाइए। राजस्थान से बाहर रहने वाले मुवक्किलों के लिए यह बातचीत फ़ोन या वीडियो पर भी उसी तरह हो जाती है, क्योंकि इस चरण में कागज़ की तारीख़ें ही देखनी होती हैं।